ईरान युद्ध पर साथ न मिलने के बाद अमेरिका नाटो की प्रासंगिकता पर फिर से विचार कर सकता है: मार्को रूबियो

क्या अमेरिका और यूरोप की पुरानी दोस्ती में दरार आ रही है? ईरान के मुद्दे पर अगर साथ नहीं दिया, तो नाटो (NATO) का साथ भी छूट सकता है!

यानी साफ है, अब अमेरिका ‘बिना शर्त’ किसी की मदद करने के मूड में नहीं है।

ईरान की जंग और नाटो का साथ: क्या अमेरिका अब अपने सबसे पुराने गठबंधन से मुंह मोड़ लेगा?

अमेरिका के बड़े नेताओं की तरफ से एक ऐसी बात सामने आई है जिसने पूरी दुनिया के रक्षा जानकारों के बीच हलचल मचा दी है। खबर यह है कि अगर ईरान के साथ कोई बड़ा विवाद होता है और नाटो देश अमेरिका का साथ नहीं देते, तो अमेरिका इस गठबंधन की उपयोगिता पर फिर से विचार कर सकता है।

क्या है मामला

इस मामले में सामने आया है कि सीनियर अमेरिकी सीनेटर मार्को रुबियो ने संकेत दिया है कि नाटो की अहमियत तभी तक है जब उसके सदस्य देश एक-दूसरे के संकट में साथ खड़े हों। उनका इशारा साफ तौर पर ईरान की तरफ था।

रिपोर्ट के अनुसार, रुबियो का मानना है कि अगर यूरोप के देश ईरान जैसे बड़े सुरक्षा खतरों पर अमेरिका को अकेला छोड़ देते हैं, तो अमेरिका के लिए इस गठबंधन को ढोते रहना मुश्किल होगा। यह बयान अमेरिका की ‘अमेरिका फर्स्ट’ वाली नीति को और मजबूती देता नजर आ रहा है।

जानकारी के मुताबिक, अमेरिका अब यह देख रहा है कि वह जिन देशों की रक्षा के लिए अरबों डॉलर खर्च करता है, क्या वे देश जरूरत पड़ने पर अमेरिका के हितों का ख्याल रखते हैं या नहीं।

मुख्य बातें

  • ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका अपने सहयोगियों से खुला समर्थन चाहता है।
  • अगर नाटो देशों ने हाथ पीछे खींचे, तो अमेरिका इस गठबंधन में अपनी सदस्यता और भूमिका को फिर से परख सकता है।
  • सीनेटर रुबियो का कहना है कि यह दोस्ती एकतरफा नहीं हो सकती।
  • यह बयान यूरोप और अमेरिका के बीच भविष्य के रिश्तों में बड़े बदलाव का संकेत है।

पृष्ठभूमि

नाटो (NATO) का गठन दूसरे विश्व युद्ध के बाद एक खास मकसद से हुआ था—ताकि अमेरिका और यूरोप मिलकर किसी भी बड़े खतरे का सामना कर सकें। दशकों से अमेरिका इस संगठन का सबसे बड़ा ताकतवर पिलर रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में अमेरिका के भीतर यह मांग उठी है कि बाकी देशों को भी अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी और खर्च उठाना चाहिए।

यह क्यों मायने रखता है

आम लोगों के लिए यह खबर इसलिए जरूरी है क्योंकि अगर नाटो जैसा दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य गठबंधन कमजोर होता है, तो पूरी दुनिया की सुरक्षा का संतुलन बिगड़ सकता है। इससे न केवल शेयर बाजार और तेल की कीमतों पर असर पड़ेगा, बल्कि दुनिया में युद्ध और अस्थिरता का खतरा भी बढ़ सकता है।

अंत में समझिए

कुल मिलाकर बात यह है कि अमेरिका अब अपने दोस्तों को परखने के मूड में है। वह साफ कह रहा है कि अगर आप हमारे दुश्मन के खिलाफ हमारे साथ नहीं खड़े हो सकते, तो हमसे अपनी रक्षा की उम्मीद रखना भी छोड़ दीजिए। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यूरोप के देश इस पर क्या रुख अपनाते हैं।

यह लेख विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर सरल रूप में तैयार किया गया है।

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