आजकल सिनेमा का रंग-ढंग काफी बदल गया है और बड़े पर्दे पर दिखाई जाने वाली जबरदस्त हिंसा अब केवल एक्शन तक सीमित नहीं रही। ‘एनिमल’, ‘धुरंधर’ और ‘ओ रोमियो’ जैसी फिल्मों की भारी सफलता और उनमें दिखाए गए आक्रामक किरदारों ने समाज, खासकर किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर एक नई बहस छेड़ दी है। मनोचिकित्सकों का मानना है कि इस तरह का चित्रण युवाओं के सोचने और महसूस करने के तरीके को गहराई से प्रभावित कर रहा है।
फिल्मों में दिखाए जाने वाले खून-खराबे और हिंसक व्यवहार को जब बार-बार ‘ग्लैमराइज’ करके पेश किया जाता है, तो किशोरों के लिए सही और गलत के बीच का अंतर धुंधला होने लगता है। वे अपने पसंदीदा नायकों को पर्दे पर कानून तोड़ते या हिंसा करते देख उसे ताकत का प्रतीक मान लेते हैं। विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस तरह का कंटेंट बच्चों के मन से डर और सहानुभूति की भावना को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है। जब कोई बच्चा लगातार स्क्रीन पर मार-धाड़ देखता है, तो वास्तविक जीवन में किसी की तकलीफ देखकर भी उसका मन विचलित नहीं होता।
## मानसिक संवेदनशीलता और सिनेमाई प्रभाव का गहरा रिश्ता
मनोचिकित्सकों के अनुसार, इस स्थिति को ‘डिसेंसिटाइजेशन’ कहा जाता है, जिसमें इंसान धीरे-धीरे हिंसा के प्रति सामान्य महसूस करने लगता है। ‘एनिमल’ जैसी फिल्मों में जिस तरह के ‘अल्फा मेल’ किरदारों को दिखाया गया है, वे किशोरों को यह संदेश देते हैं कि गुस्सा और आक्रामकता ही मर्दानगी की असली पहचान है। ‘धुरंधर’ और ‘ओ रोमियो’ जैसी फिल्मों के साथ भी यही समस्या है, जहाँ हिंसा को कहानी की जरूरत बताकर पेश किया जाता है, लेकिन एक कच्ची उम्र के दिमाग पर इसका असर काफी गंभीर और स्थाई हो सकता है।
डॉक्टरों का कहना है कि किशोरावस्था वह समय होता है जब दिमाग और व्यक्तित्व का विकास हो रहा होता है। ऐसे में जब वे पर्दे पर अपने चहेते सितारों को हिंसक व्यवहार करते देखते हैं, तो उनके व्यवहार में भी चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ने लगता है। वे छोटी-छोटी बातों पर आक्रामक प्रतिक्रिया देने लगते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि समस्याओं का समाधान केवल ताकत से ही संभव है। यह न केवल उनके सामाजिक रिश्तों को प्रभावित करता है, बल्कि उनके भीतर दूसरों के प्रति दया और करुणा जैसे गुणों को भी कम कर देता है।
सिनेमा को समाज का आईना कहा जाता है, लेकिन जब आईना ही धुंधला हो जाए तो समाज की दिशा भटकने लगती है। अभिभावकों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे अपने बच्चों के साथ बैठकर इन विषयों पर बातचीत करें और उन्हें समझाएं कि पर्दे की दुनिया और हकीकत में बहुत बड़ा अंतर होता है। फिल्मों को केवल मनोरंजन की तरह देखना और उनके नकारात्मक पहलुओं को न अपनाना ही एक स्वस्थ मानसिक विकास की दिशा में सही कदम होगा।