कभी आपने खुद को यह कहते हुए पकड़ा है कि “वो बस अभी बिजी है, इसलिए रिप्लाई नहीं कर रहा” या “वो ऐसा नहीं है जैसा दिख रहा है, अंदर से बहुत अच्छा है”? अगर हाँ, तो हो सकता है आप भी अनजाने में एक ऐसे ट्रेंड का हिस्सा बन चुके हैं, जो दिखता तो बहुत खूबसूरत है, लेकिन उसकी सच्चाई थोड़ी असहज कर सकती है।
आजकल सोशल मीडिया पर ‘डेलुलु’ यानी डेल्यूशनल लव का ट्रेंड तेजी से फैल रहा है, खासकर जेन-जी के बीच। यह सिर्फ एक मज़ाक या इंटरनेट स्लैंग नहीं रह गया है, बल्कि धीरे-धीरे यह डेटिंग का एक नया तरीका बनता जा रहा है, जहाँ लोग हकीकत को थोड़ी देर के लिए साइड में रखकर अपने मन में एक परफेक्ट कहानी बना लेते हैं। इस कहानी में सामने वाला इंसान वैसा होता है जैसा हम उसे देखना चाहते हैं, न कि जैसा वह असल में है।
“डेलुलु इज द सोलुलु” इस ट्रेंड का सबसे चर्चित जुमला है, और पहली नजर में यह मासूम सा लगता है। लेकिन इसके पीछे एक गहरी मनोवैज्ञानिक सच्चाई छिपी है। जब हम किसी को पसंद करते हैं, तो हमारा दिमाग अपने आप उनकी कमियों को कम करके और अच्छाइयों को बढ़ा-चढ़ाकर देखने लगता है। इसे साइकोलॉजी में “कॉग्निटिव बायस” कहा जाता है। यानी हमारा दिमाग खुद को दुख से बचाने के लिए एक सी कहानी बना लेता है, जिसमें सब कुछ ठीक लगता है, भले ही हकीकत कुछ और कह रही हो।
आज की डेटिंग दुनिया पहले से कहीं ज्यादा जटिल हो चुकी है। डेटिंग ऐप्स, अनगिनत ऑप्शन्स और लगातार होने वाले रिजेक्शन के बीच इंसान भावनात्मक रूप से थकने लगता है। ऐसे में ‘डेलुलु’ एक तरह का मानसिक शॉर्टकट बन जाता है। यह हमें थोड़ी देर के लिए सुकून देता है, क्योंकि हम उस सच्चाई को नजरअंदाज कर देते हैं जो हमें चोट पहुंचा सकती है। हम उन छोटे-छोटे पलों में खुशी ढूंढ लेते हैं, जो शायद उतने बड़े नहीं होते, लेकिन हमारी कल्पना उन्हें खास बना देती है।
यही इस ट्रेंड की सबसे खामोश ताकत है। यह आपको टूटने से बचाता है, लेकिन धीरे-धीरे आपको सच्चाई से भी दूर ले जाता है। जब आप बार-बार किसी के रेड फ्लैग्स को नजरअंदाज करते हैं, यह सोचकर कि “वो बदल जाएगा” या “वो अलग है”, तब असल में आप अपने दिमाग को एक झूठी उम्मीद पर टिकाए रखते हैं। यह उम्मीद कुछ समय तक आपको खुश रख सकती है, लेकिन लंबे समय में यह आपको और ज्यादा गहराई से चोट पहुंचा सकती है।
हालांकि, इसे पूरी तरह गलत कहना भी सही नहीं होगा। कई बार थोड़ी सी ‘डेलुलु’ सोच आपको मुश्किल हालात में भी पॉजिटिव रहने की ताकत देती है। यह आपको रिजेक्शन के डर से बचाती है और रिश्तों में उम्मीद बनाए रखने में मदद करती है। एक हद तक यह आपके मानसिक संतुलन को बनाए रखने का तरीका भी हो सकता है। लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि आप इसे एक खेल की तरह खेल रहे हैं या इसे अपनी पूरी सच्चाई मान बैठे हैं।
असल समस्या तब शुरू होती है जब यह कल्पना आपकी आंखों पर पट्टी बन जाती है। जब आप सच्चाई को देखना बंद कर देते हैं और हर बार खुद को एक ही कहानी सुनाते रहते हैं, तब आप सिर्फ एक इंसान को नहीं, बल्कि अपने खुद के इमोशन्स को भी धोखा दे रहे होते हैं। रिश्ते सिर्फ उम्मीद पर नहीं चलते, उन्हें समझ, ईमानदारी और हकीकत की जमीन भी चाहिए होती है।
इसलिए ‘डेलुलु’ में रहना गलत नहीं है, लेकिन उसमें खो जाना जरूर खतरनाक हो सकता है। अगर यह आपको मुस्कुराने की वजह दे रहा है, तो इसे महसूस कीजिए, लेकिन अपनी नजरें पूरी तरह बंद मत कीजिए। क्योंकि प्यार में सबसे बड़ी गलती यह नहीं होती कि आपने किसी को ज्यादा चाहा, बल्कि यह होती है कि आपने खुद को कम समझ लिया।