क्या मौत पर भी हमारा हक हो सकता है? भारत में ‘इच्छा मृत्यु’ को लेकर छिड़ी ये बहस आपको सोचने पर मजबूर कर देगी।
सीधे शब्दों में कहें तो, ये जिंदगी और मौत के बीच के उस मोड़ की कहानी है जहां कानून और इंसानियत एक साथ खड़े हैं।
सम्मान के साथ विदाई: भारत में ‘इच्छा मृत्यु’ को लेकर क्या हैं नियम और क्यों छिड़ी है ये बहस?
जब कोई इंसान ऐसी बीमारी से जूझ रहा हो जिसका कोई इलाज न हो, तो क्या उसे सम्मान से मरने का हक मिलना चाहिए? भारत में ‘इच्छा मृत्यु’ (Euthanasia) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ बड़े फैसले लिए हैं, जिन्हें समझना हर आम नागरिक के लिए जरूरी है।
क्या है मामला
इस मामले में सामने आया है कि भारत में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ यानी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को कानूनी मान्यता मिल चुकी है। इसका मतलब है कि अगर कोई मरीज सिर्फ लाइफ सपोर्ट के भरोसे है और उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं बची है, तो इलाज रोककर उसे गरिमा के साथ जाने दिया जा सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने इसके नियमों को पहले से थोड़ा आसान कर दिया है। अब परिवार और डॉक्टरों को लंबी कानूनी प्रक्रियाओं के लिए बार-बार कोर्ट के चक्कर नहीं काटने पड़ते, बल्कि मेडिकल बोर्ड की सलाह पर फैसला लिया जा सकता है।
जानकारी के मुताबिक, कोर्ट का मानना है कि हर इंसान को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है और इसमें गरिमा के साथ मरना भी शामिल है। हालांकि, भारत में अभी भी किसी को ‘जहर का इंजेक्शन’ देकर मारना (Active Euthanasia) पूरी तरह गैर-कानूनी है।
मुख्य बातें
- भारत में सिर्फ ‘पैसिव यूथेनेशिया’ यानी इलाज रोकने की ही इजाजत है।
- इंसान अपनी ‘लिविंग विल’ (Living Will) बना सकता है, जिसमें वह पहले ही लिख सकता है कि दिमागी रूप से मृत होने पर उसे लाइफ सपोर्ट न दिया जाए।
- इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया के लिए दो अलग-अलग मेडिकल बोर्ड्स की मंजूरी अनिवार्य है।
- यह अधिकार केवल उन मरीजों के लिए है जो लाइलाज बीमारी (Terminal Illness) के आखिरी स्टेज पर हैं।
पृष्ठभूमि
भारत में इस बहस की शुरुआत अरुणा शानबाग के मशहूर केस से हुई थी, जो करीब 42 सालों तक अस्पताल के बिस्तर पर कोमा में रहीं। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ किया कि ‘सम्मान से मरना’ भी संविधान द्वारा दिए गए जीवन के अधिकार (Article 21) का ही हिस्सा है।
यह क्यों मायने रखता है
यह मुद्दा सीधे तौर पर हमारे जीने के तरीके और परिवार की भावनाओं से जुड़ा है। अक्सर ऐसे मामलों में परिवार न केवल आर्थिक रूप से टूट जाता है, बल्कि अपने किसी प्यारे को तिल-तिल मरते देखना उनके लिए सबसे बड़ा मानसिक बोझ होता है। यह नियम उन लोगों को एक विकल्प देता है जिन्हें विज्ञान भी अब नहीं बचा सकता।
अंत में समझिए
कानून चाहे जो भी रास्ता निकाले, लेकिन इच्छा मृत्यु का मुद्दा हमेशा भावनाओं और नैतिकता के बीच फंसा रहेगा। मकसद किसी की जान लेना नहीं, बल्कि उस तड़प को खत्म करना है जिसका कोई अंत नहीं दिख रहा। यह कानून इंसान को उसकी जिंदगी के आखिरी सफर पर सम्मान के साथ विदा करने की एक कोशिश है।
यह लेख विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर सरल रूप में तैयार किया गया है।