कल्पना कीजिए, दो बड़े दिग्गजों की लड़ाई में अगर पिसना आपको पड़े तो आप क्या करेंगे? खाड़ी देशों का हाल कुछ ऐसा ही है, जहाँ अब अमेरिका की बातों पर भरोसा कम और डर ज़्यादा लगने लगा है।
यानी साफ है, अरब देश अब दूसरों की जिद की खातिर अपना घर जलते हुए नहीं देखना चाहते।
अमेरिका और ईरान की तनातनी: आखिर क्यों खाड़ी देशों का सब्र अब जवाब दे रहा है?
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती कड़वाहट ने खाड़ी देशों (Gulf countries) की नींद उड़ा दी है। सालों तक अमेरिका के पाले में रहने वाले ये देश अब उसकी नीतियों से परेशान होकर अपने लिए एक नया और सुरक्षित रास्ता तलाश रहे हैं।
क्या है मामला
इस मामले में सामने आया है कि सऊदी अरब और यूएई जैसे देश अब अमेरिका की ‘ईरान नीति’ से खुश नहीं हैं। उन्हें लग रहा है कि अमेरिका केवल अपनी राजनीति साध रहा है, जबकि युद्ध की स्थिति में सबसे पहले बलि का बकरा खाड़ी देश ही बनेंगे।
रिपोर्ट के अनुसार, खाड़ी देशों को अब इस बात का अहसास हो गया है कि अगर ईरान के साथ कोई भी बड़ी जंग छिड़ती है, तो ईरान के निशाने पर सबसे पहले उनके तेल के कुएं और आलीशान शहर होंगे। जानकारी के मुताबिक, इसीलिए ये देश अब अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय खुद ईरान से हाथ मिलाने या बातचीत करने की कोशिश कर रहे हैं।
मुख्य बातें
- खाड़ी देशों को अब अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर पहले जैसा भरोसा नहीं रहा।
- युद्ध का सीधा असर तेल की सप्लाई पर पड़ेगा, जिससे इन देशों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बाद हो सकती है।
- सऊदी अरब और यूएई अब ‘दुश्मनी’ छोड़कर बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने पर जोर दे रहे हैं।
- ट्रंप प्रशासन की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ वाली नीति ने खाड़ी क्षेत्र में तनाव को कम करने के बजाय और बढ़ा दिया है।
पृष्ठभूमि
दशकों से खाड़ी देश अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रहे हैं। लेकिन हाल के सालों में जब उनके तेल टैंकरों और रिफाइनरियों पर हमले हुए, तो अमेरिका ने वैसी मदद नहीं की जैसी उन्हें उम्मीद थी। इसी बात ने खाड़ी देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या वाकई मुश्किल वक्त में अमेरिका उनके साथ खड़ा होगा?
यह क्यों मायने रखता है
यह खबर पूरी दुनिया के लिए बड़ी है क्योंकि अगर खाड़ी में तनाव बढ़ता है, तो पेट्रोल और डीजल के दाम रातों-रात आसमान छूने लगेंगे। भारत जैसे देशों के लिए यह और भी गंभीर है क्योंकि हमारे लाखों लोग वहां काम करते हैं और हमारी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा वहीं से आता है। अगर वहां शांति नहीं रही, तो इसका असर सीधे हमारी जेब और सुरक्षा पर पड़ेगा।
अंत में समझिए
सीधी बात यह है कि खाड़ी देश अब समझ चुके हैं कि अपनी शांति के लिए उन्हें खुद ही पहल करनी होगी। वे अब अमेरिका के ‘रिमोट कंट्रोल’ से चलने को तैयार नहीं हैं। वे चाहते हैं कि उनके इलाके में गोलियों की गूंज नहीं, बल्कि व्यापार और तरक्की की बातें हों।
यह लेख विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर सरल रूप में तैयार किया गया है।