पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के उत्सव से पहले ही सियासी पारा चढ़ गया है। ममता बनर्जी और भाजपा के बीच पंडालों की अनुमति को लेकर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है।
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा पर घमासान: ममता बनर्जी ने भाजपा को बताया ‘बंगाल विरोधी’
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए उसे ‘बंगाल विरोधी’ पार्टी करार दिया है। यह विवाद कोलकाता में कुछ प्रमुख दुर्गा पूजा पंडालों को अनुमति मिलने में हो रही देरी और प्रशासनिक नियमों को लेकर पैदा हुआ है।
क्या है पूरा मामला
विवाद की मुख्य वजह कोलकाता का ‘संतोष मित्रा स्क्वायर’ पूजा पंडाल है, जिसके प्रमुख आयोजक भाजपा नेता सजल घोष हैं। भाजपा का आरोप है कि राज्य सरकार जानबूझकर उनके समर्थकों द्वारा आयोजित की जाने वाली पूजा में अड़ंगे डाल रही है और सुरक्षा के नाम पर अनुमति देने में देरी कर रही है। इसके जवाब में ममता बनर्जी ने कहा कि भाजपा त्योहारों के नाम पर राजनीति कर रही है और बंगाल की संस्कृति को बदनाम करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने साफ किया कि नियम सबके लिए बराबर हैं और किसी को भी माहौल बिगाड़ने की इजाजत नहीं दी जाएगी।
मुख्य बातें
- ममता बनर्जी ने भाजपा पर राज्य की छवि खराब करने और ‘बंगाल विरोधी’ होने का आरोप लगाया।
- संतोष मित्रा स्क्वायर पंडाल की अनुमति को लेकर दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ा।
- भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस सरकार पर बदले की राजनीति और पक्षपात करने का आरोप लगाया है।
- प्रशासन का कहना है कि भीड़ और सुरक्षा कारणों से नियमों का पालन अनिवार्य है।
- दुर्गा पूजा से ठीक पहले इस विवाद ने राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण को तेज कर दिया है।
पृष्ठभूमि
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह राज्य की अस्मिता और राजनीति का भी बड़ा केंद्र है। पिछले कुछ वर्षों में टीएमसी और भाजपा के बीच इस बात को लेकर होड़ मची रहती है कि कौन बंगाल की संस्कृति का असली रक्षक है। इससे पहले भी कई बार भाजपा नेताओं द्वारा आयोजित पूजा कार्यक्रमों को लेकर राज्य सरकार के साथ उनका टकराव देखने को मिला है।
यह क्यों अहम है
यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान जनसैलाब उमड़ता है और यह जनता के बीच अपनी पैठ बनाने का सबसे बड़ा मौका होता है। भाजपा जहां इसे धार्मिक आधार पर घेराबंदी के रूप में देख रही है, वहीं ममता बनर्जी इसे ‘बाहरी बनाम बंगाली’ की लड़ाई के तौर पर पेश कर रही हैं। चुनाव से पहले इस तरह के सांस्कृतिक विवाद मतदाताओं की भावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं।
अंत में समझिए
निष्कर्ष यह है कि बंगाल की राजनीति अब पूरी तरह से त्योहारों के पंडालों तक पहुंच गई है। जहां आम जनता पूजा की तैयारी में जुटी है, वहीं राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और बढ़ सकता है।
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