क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि डॉक्टर ने आपको सिर्फ 5 दिन की दवा लिखी, लेकिन मेडिकल स्टोर से आपको पूरी 10 या 15 गोलियों की पट्टी खरीदनी पड़ी। यह एक आम समस्या है, जिससे लगभग हर मरीज गुजरता है। लेकिन अब इस स्थिति को बदलने की तैयारी हो रही है।
सरकार एक ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर रही है, जिसमें मेडिकल स्टोर को उतनी ही दवा बेचनी होगी, जितनी डॉक्टर ने लिखी है। यानी अगर आपको 5 टैबलेट्स की जरूरत है, तो आपको पूरी पट्टी खरीदने की मजबूरी नहीं होगी ।
मरीजों के लिए राहत, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती
यह प्रस्ताव मरीजों के लिए राहत लेकर आ सकता है। इससे न केवल अनावश्यक खर्च कम होगा, बल्कि दवाओं की बर्बादी भी घटेगी। लंबे समय से मरीजों के संगठन इस मांग को उठा रहे थे कि उन्हें जरूरत से ज्यादा दवा खरीदने के लिए मजबूर न किया जाए ।
लेकिन जहां एक तरफ यह फैसला मरीजों के लिए फायदेमंद दिखता है, वहीं दूसरी तरफ इससे जुड़े कई गंभीर सवाल भी सामने आ रहे हैं।
मेडिकल स्टोर्स क्यों कर रहे हैं विरोध
देशभर के केमिस्ट्स और दवा विक्रेताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था All India Organisation of Chemists and Druggists ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है।
उनका कहना है कि अगर दवाओं की पट्टियां काटकर बेची जाएंगी, तो बची हुई दवाएं बेकार हो जाएंगी। इन्हें न तो वापस कंपनियों को लौटाया जा सकता है और न ही दोबारा बेचा जा सकता है। इससे दुकानदारों को सीधा नुकसान होगा ।
सुरक्षा से जुड़ा बड़ा खतरा
इस पूरे मुद्दे में सबसे बड़ी चिंता दवा की सुरक्षा को लेकर है। जब दवाओं की स्ट्रिप काटी जाती है, तो उस पर लिखी जरूरी जानकारी जैसे बैच नंबर और एक्सपायरी डेट हट सकती है।
इससे मरीजों की सुरक्षा पर खतरा बढ़ सकता है और किसी समस्या की स्थिति में दवा को ट्रैक करना मुश्किल हो जाएगा ।
समाधान क्या हो सकता है
केमिस्ट्स ने इस समस्या का एक अलग समाधान सुझाया है। उनका कहना है कि दवा कंपनियां अलग-अलग मात्रा में पैकिंग तैयार करें, ताकि मरीज को उतनी ही दवा मिल सके जितनी उसे चाहिए।
इसके साथ ही उन्होंने यह भी मांग की है कि हर टैबलेट या छोटे पैक पर जरूरी जानकारी छपी हो, ताकि सुरक्षा से कोई समझौता न हो।
आगे क्या होगा
फिलहाल यह प्रस्ताव विचाराधीन है और इसे एक विशेषज्ञ समिति के पास भेजा गया है, जो इससे जुड़े तकनीकी पहलुओं का अध्ययन करेगी ।
अंत में बात बहुत साफ है। यह बदलाव जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं। इसमें मरीजों की सुविधा, दुकानदारों का नुकसान और दवाओं की सुरक्षा, तीनों के बीच संतुलन बनाना होगा।
क्योंकि यहां सवाल सिर्फ दवा का नहीं, बल्कि भरोसे और जिम्मेदारी का भी है।