पहलगाम आतंकी हमले पर गहलोत की टिप्पणी: एकजुटता के साथ जवाबदेही भी ज़रूरी

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब हम देश में विकास, तकनीकी प्रगति और अंतरराष्ट्रीय मंच पर साख की बातें करते हैं, उसी समय हमारे सामने एक ऐसा दुखद घटनाक्रम सामने आता है जो हमें हमारी असुरक्षाओं की याद दिलाता है। दक्षिण कश्मीर के पहलगाम में हुआ आतंकी हमला, जिसमें 26 निर्दोष लोगों की जान गई, उन सभी सवालों को फिर से ज़िंदा कर देता है जिनके जवाब आज भी अधूरे हैं। इस हमले ने न सिर्फ़ जान-माल का नुक़सान किया है, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर हमारे भरोसे पर भी गहरा आघात किया है।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का यह कहना कि पूरा देश इस समय सरकार के साथ खड़ा है, कोई राजनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना का संकेत है जो हर संकट के समय भारतीय समाज में स्वतः जाग उठती है। गहलोत का यह भी कहना कि प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को इस मुद्दे पर पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, एक परिपक्व विपक्ष की जिम्मेदार प्रतिक्रिया कही जा सकती है। यह वह पल नहीं है जब हम राजनीतिक अंकगणित में उलझें या बहस करें कि किसने क्या किया और क्या नहीं किया। यह वह समय है जब एकजुटता दिखाना और नेतृत्व को निर्णायक फैसले लेने की छूट देना ज़रूरी हो जाता है।

परंतु गहलोत की बातों में छुपी हुई चिंता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि 13 दिन बीत जाने के बाद भी सरकार ने अब तक जनता के सामने कोई स्पष्ट नीति या उत्तर क्यों नहीं रखा। यह आलोचना नहीं, बल्कि लोकतंत्र में ज़िम्मेदारी की एक याद दिलाने वाली बात है। जनता का सवाल पूछना उसका अधिकार है और जवाब देना सत्ता की जिम्मेदारी। अगर सरकार हर बार केवल ‘बड़ी बातें’ करके निकल जाती है, तो धीरे-धीरे जनता का विश्वास भी कमजोर पड़ने लगता है।

गहलोत ने सही कहा कि ऐसे निर्णय उत्साह में नहीं लिए जाते। लेकिन निर्णय का अभाव भी अपने आप में एक बयान बन जाता है — वह बयान जो दुनिया को हमारी हिचकिचाहट और अंदरूनी भ्रम की झलक देता है। हमारे पड़ोसी देश में सेना चाहे सीधे फैसले लेती हो, पर हमारे यहां लोकतांत्रिक मर्यादाएं हैं, और ये मर्यादाएं हमें मजबूर नहीं करतीं, बल्कि हमें जिम्मेदार बनाती हैं।

सरकार को चाहिए कि वह इस आतंकी हमले के पीछे की साजिशों को न केवल उजागर करे, बल्कि एक सशक्त और निर्णायक जवाब भी दे — वह जवाब जो कूटनीति, सैन्य रणनीति और मानवीय गरिमा तीनों को साथ लेकर चले। और सबसे ज़रूरी बात — यह जवाब सिर्फ़ ‘कार्रवाई’ नहीं बल्कि ‘दृष्टिकोण’ के रूप में सामने आना चाहिए।

Most Read

Last Week